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Showing posts from January, 2020

Valentine's Day shayri

दिन बा दिन बढ़ता रहा, वक़्त इंतज़ार का
फिर आ के फरवरी पे अटका , मामला इकरार का


ना मौसम का मोहब्बत से ताल्लुक़, ना राब्ता इज़हार का
फिर रहा दरमियां बाकि, मुद्दा क्या तकरार का



मान ले अब इल्तेज़ा, ले फरवरी भी आ गई
बस भी कर अब खत्म कर दे ,सिलसिला इनकार का




राब्ता -   relation, connection
इल्तेज़ा - request


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Khushnavar shayri

मैं था नेक बंदा ना खोया कभी किसी  खयाल मे 
मैं ना रोया था ग़म ऐ उल्फत में कभी, ना किसी हाल में


चढ़ा  है जब से नशा खुशनवारी का साहेब
उलझ के रह गया हूँ अपने ही लफ़्ज़ों के जाल में

खुशनवारी -   writing shayri , poem, etc
उल्फ़त -   love


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Izhar shayri

रुसवा है आँखो के इशारे मोहब्बत की गली में
लाजिम है इश्क़ मेरे यार का जुबां से बयां हो

खामोशी हो दरमियां वक़्त ए इज़हार मगर
चेहरे पे गुलाबों सी हंसी और आँखों में हया हो



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Dosti shayri

ना वो आफरीन अंदाज ना वो रवायतें
ना दोस्तों की नवाजिश ए मुलाक़ात रही

मुख्तसर होती रही बाते दिन ब दिन
ना खाली दिन ना सुकून भरी रात रही

ना कभी मिलना ना मिल के झगड़ना
ना पहले सा हुज़ूम ना वो जमात रही

यूँ तो कहने को आया करते है रोज मगर
ना इस महफ़िल मे पहले वाली बात रही


मुख्तसर -  short, brief
आफरीन - alluring
नवाजिश - kindness
 हुजूम - gathering, crowd


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Dosti shayri

हो कर मशरूफ  कश्मकश ए हयात मे
बेखबर बेसबब किस उलझन मे फंसा हूँ


मिल गए कुछ यार कूचा ए रोजगार मे
आज एक मुद्दत बाद मैं खुल के हंसा हूँ


हयात- जिंदगी, life
मशरूफ - व्यस्त, busy
बेसबब - बेवजह

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Izhaar shayri, propose shayri

करता रहा इकतरफा मोहब्बत अरसों से अब लगा चुपचाप करने मे मजा क्या है
र दिया है बयां हाल ए दिल सरेआम
इकरार है या इनकार, तेरी रज़ा क्या है


इकरार- acceptance, स्वीकार
रज़ा- मर्जी

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Raat shayri

रात, चांद ,तारे और तन्हाई
अधूरे ख़्वाब, अधूरी रुबाई

लाज़िम है तसव्वुर में आये
मेरी मोहब्बत , मेरी जुदाई  


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Shayri

चर्चा तेरे हुस्न का है महज, कूचे मे
वाक़िफ़ तेरी फितरत से मगर सब है

सौ बार की है मोहब्बत तुमने करने को
इक बार भी है याद निभाई कब है?



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Mulaqaat shayri

एक नज़र देख के रहा ना दिल पे काबू
आईने सा चेहरे पे कमाल क्या खूब था

खत्म हुई तलाश मुलाक़ात पे आ कर
निगाहें उठाई और सामने महबूब था  

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Love shayri

मुमकिन नही हिज्र तेरा भूल पाना तू और तेरी चाहत दोनो एक सी है

चाहूँ तो कर लूँ तौबा तेरे दर से मगर                              तेरी लत और ये मोहब्बत दोनो एक सी है

हिज़्र - separation, जुदाई


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Shayri

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जानिब-   direction, side, ओर, तरफ
रहबर - guide, मार्गदर्शक
जुस्तजू -   quest, खोज, तलाश

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Tareef shayri

मीर की ग़ज़ल हो या शायर का ख़ाब हो तुम ?
शबनम की बूँद हो या नूर ऐ आफताब हो तुम ?
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सज संवर के यूँ निकली हो गिराई है बिजलियाँ
नींदों को उड़ाने वाली हसीना लाजवाब हो तुम

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chand shayri

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बारिश

कभी बूंद बूंद को तरसाया कभी दरख़्त दीवारों को तोड़ा
ना मैं खुद झुका ना रुख हवाओं का मैंने मोड़ा
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अंदाज इसका भी है कुछ कुछ मेरे महबूब सा
बिन मौसम की इस बरसात ने मुझे कहीं का ना छोड़ा


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शाम शायरी

शाम ही से शुरू होता है यादों का सिलसिला
शब होते होते पुर जोर रवानी पे आता है

हसरतें बढ़ती है दीदार ऐ यार की फिर
सहर होने से दिल को सुकून आता है

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हश्र शायरी

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Seher shayri

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मुमकिन नही हर ख़्वाब मुकम्मल होना
अधूरे ख्वाबों का जिक्र इबादत में होता है
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होता नही ग़र हासिल कुछ इबादतों से
टूटे ख़्वाबों का जिक्र ज़ियारत में होता है


Mukammal- complete
Ibadat-pray
Jiyarat-  religious journey

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लिखकर मिटा देता हूँ तुझको अपने जेहन से     बेहतर खयाल की तलाश दिन रात करता हूँ

कोई यूँ ना समझे कि मोहब्बत हुई है किसी से मैं शायर हूँ और शायरी की बात करता हूँ 

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वो कहता है चाँद में भी दाग़ है सुनील
मग़रूर इतना है अकड़ में मदहोश है


ग़ुरूर चाँद का है मुनासिब अगर मेरी मानो
तुम दाग़ ही देखते हो तुम्हारा दोष है   

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थम गया वक्त,थम गया बातों का सिलसिला
ना मंजिल है ना मजलिस ए यार कोई बाकि है

निकल पड़ा हूँ रात की खामोशियों में अकेले
ना साथ रहबर है ना मददग़ार कोई बाकि है

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चन्द तस्वीरों में है बाकि उल्फत के निशां
किताबों में सूखा कोई गुलाब मेरे पास नहीं

सबब खुद ही बना अपनी तबाही का मैं
इल्जाम तुझ पे कोई आये मुझे रास नहीं


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गुजरती बेनयाज़ी मुझे नागवार उसकी
उसे पसन्द नहीं मेरा हद से गुजर जाना

आया नही इश्क़ हदों में करना मुझको
उसे आता था करके किनारा गुजर जाना 

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होती नही रात खलिश में बसर
नश्तर सी चुभन है, सुआ कोई लगे

मत पूछ इश्क़ लाइलाज कितना
बेअसर दवा  ना दुआ कोई लगे


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भूल जाओ बेशक मुझे ए सनम
तर्क ऐ ताल्लुक़ ये बड़ी बात नही

नज़ारे और भी है बहुत दुनिया में
सितारे गर्दिश में हैं खफ़ा रात नहीं


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नाहक है उम्मीद किसी से करना
बर्बाद यूँ ना अपने जज्बात कर

बना ले अपनी अलग दुनिया सुनील
वक़्त खुद से मिले तो किसी से बात कर 

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मुझ पर है नवाज़िशें मेरे रब की बेशुमार
दे के वो दर्द पूछता है क्या गिला है

सब जानकर भी बेखबर है मेरे हश्र से
क्या यही मेरी बंदगी का सिला है

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मालूम था फ़ितरत है उनकी बेवक्त चले जाना
सब जानकर भी ,क्यूँ मैं खुद ही पे जफ़ा करता

हासिल था उल्फत में फ़क़त ग़म ही सुनिल
किसी कातिल से जो मैं उम्मीद ऐ वफ़ा करता

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नहीं था उल्फत का इरादा ना सही
ये तो महज चाहत की बात थी


जरा सी बात पर सर पे उठा ली दुनिया तुमने
कुछ और होता तो क्या बात थी 

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वो इक शाम जो गुजरी थी रफाकत में कभी
फिर ना आएगी लौट कर इतना तो तय है

झील में खेलती कश्ती और मांझी का जुनूँ
संभल गया तो पानी है जो बहका तो मय है 

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जलता है चाँद भी जुगनू से भला
रोशन जुगनू से कहाँ रात होती है

सवाल रोशनी का रहा अपनी जगह
फर्क पड़ता है वजूद की जहाँ बात होती है 


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आदत इबादत की मेरी जाती नहीँ
हद से ज्यादा दिल्लगी मुझे भाती नही

जुस्तजूँ बस इक तेरी है और एक तू है
जो जाती है तो लौट के आती नही


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