बारिश

कभी बूंद बूंद को तरसाया कभी दरख़्त दीवारों को तोड़ा
ना मैं खुद झुका ना रुख हवाओं का मैंने मोड़ा
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अंदाज इसका भी है कुछ कुछ मेरे महबूब सा
बिन मौसम की इस बरसात ने मुझे कहीं का ना छोड़ा


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