Monday, January 13, 2020

बारिश

कभी बूंद बूंद को तरसाया कभी दरख़्त दीवारों को तोड़ा
ना मैं खुद झुका ना रुख हवाओं का मैंने मोड़ा
.
.
अंदाज इसका भी है कुछ कुछ मेरे महबूब सा
बिन मौसम की इस बरसात ने मुझे कहीं का ना छोड़ा

No comments:

Post a Comment

Dosti shayri

हो कर मशरूफ  कश्मकश ए हयात मे बेखबर बेसबब किस उलझन मे फंसा हूँ मिल गए कुछ यार कूचा ए रोजगार मे आज एक मुद्दत बाद मैं खुल के हंसा हूँ ...