हश्र शायरी, hashra shayari

मुझ पर है नवाज़िशें मेरे रब की बेशुमार
दे के वो दर्द पूछता है क्या गिला है

सब जानकर भी बेखबर है मेरे हश्र से
क्या यही मेरी बंदगी का सिला है

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