आदत इबादत की मेरी जाती नहीँ

आदत इबादत की मेरी जाती नहीँ
हद से ज्यादा दिल्लगी मुझे भाती नही

जुस्तजूँ बस इक तेरी है और एक तू है
जो जाती है तो लौट के आती नही


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