Friday, January 10, 2020

वो इक शाम जो गुजरी थी रफाकत में कभी
फिर ना आएगी लौट कर इतना तो तय है

झील में खेलती कश्ती और मांझी का जुनूँ
संभल गया तो पानी है जो बहका तो मय है 

No comments:

Post a Comment

Dosti shayri

हो कर मशरूफ  कश्मकश ए हयात मे बेखबर बेसबब किस उलझन मे फंसा हूँ मिल गए कुछ यार कूचा ए रोजगार मे आज एक मुद्दत बाद मैं खुल के हंसा हूँ ...