Shaam shayari, वो इक शाम जो गुजरी थी रफाकत में कभी

वो इक शाम जो गुजरी थी रफाकत में कभी
फिर ना आएगी लौट कर इतना तो तय है

झील में खेलती कश्ती और मांझी का जुनूँ
संभल गया तो पानी है जो बहका तो मय है 

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