Dil shayri

तुम क्या जानोगे मेरे दिल मे क्या है
खाली मकां है या कोई रहता यहाँ है

मेहमां बन के आये मुसाफिर बहुत
रहने को हमेशा,कोई आता कहाँ है

आती कहाँ बहार खिज़ाओं मे कभी
खुद ही बना बाग, खुद ही बागबाँ है

साहिल से महरूम हो जैसे लहरे
आबशार ये सूखा,बिन पानी बहा है

अब ये दिल नही बयाबान है कोई
बामुश्किल् परिंदा कोई, जाता जहाँ है


खिज़ा - पतझड़
बागबाँ- माली
महरूम- वंचित
बयाबां - उजाड़, सुनसान जंगल
आबशार - झरना

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